राम की लीला है रामायण
चलो करें इसका पारायण
दशरथ राजा अति पराक्रमी
उनके जीवन में है एक कमी
पुत्र प्राप्ति के किए वह उपाय
ऋषि श्रृंग की लेकर के सहाय
यज्ञ से निकली अलौकिक खीर
तीनों रानियों ने उसे बांटा फिर
स्वयं विष्णु चतुह विस्तार आए
राम लक्ष्मण भरत शत्रुघ्न कहाए
बाल लीला मधुर है हर क्षण
राजा रानी का लगा हुआ मन
विश्वामित्र का हुआ आगमन
राम को भेजने का नहीं मन
वसिष्ठ के समझाने पर माने
तैयार हो गए राम को भीजाने
तड़का सुबाहु का किया संहार
दिव्य अस्त्रों का मिला उपहार
मिथिला में सही समय प्रवेश
धनुष उठाया मिला गुरु आदेश
राम सीता की शाश्वत है जोड़ी
स्वयंवर औपचारिकता थोड़ी
समाचार पा दशरथ महाराज
हर्षित लाए गाजे बाजे साज
जनक दशरथ में हुई सलाह
चारों भाइयों का हुआ विवाह
अयोध्या में हुआ इतना उल्लास
चारों और फैला हुआ है प्रकाश
कुछ दिन में दशरथ यह जाने
वृद्ध वह अपने को जब माने
कौन इस राज्य का हो अधिकारी
सभासदों से ली उन्होंने जानकारी
एक स्वर में यह बात सबने कही
राम ही जिम्मेदारी उठाएंगे सही
राम के हैं गुण अनंत अपार
यह तो जाने सारा ही संसार
शील,सौंदर्य,वीरता अनंत
राजा के रूप में होंगे संत
सारे भाइयों में स्नेह है सदा
पर नियति ने कुछ और बदा
सब अभिषेक की करें तैयारी
एक व्यक्ति पर पड़ा यह भारी
मंथरा की अजब है कुटिलता
उसे न भाती है यह सरलता
केकई के मन में तब भरा जहर
अब जो हो सोच मैं जाता सहर
केकई ने कोप भवन किया प्रवेश
दशरथ की प्रिय रानी वह विशेष
उनसे यह दशा न देखी तब गई
बहलाने बातें बोली उन्होंने कई
केकई ने दिलाए उन्हें याद वर
राम को छोड़ना पड़ेगा अब घर
भरत को राजा करो अभी घोषित
हम नहीं रहेंगे इस तरह शोषित
दशरथ के तो अब बोल न फूटे
उनके सारे सपने थे अब टूटे
राम को वनवास का कष्ट देना
इतनी कठिन बात कैसे कहना
केकई कहती राम को बुलाओ
तुरंत उसे यह निर्णय बताओ
दशरथ हो गए है अब लाचार
अनहोनी के बनते हैं आसार
राम आए पिता आज्ञा को सुन
केकई की वही पुरानी है धुन
राम तुमको चौदह साल जाना
भरत हो हमने अब राजा माना
हे पिता माता यह आदेश दिया
मेरे जीवन को कृतार्थ है किया
राम के माथे बदली न एक रेखा
क्या ऐसा मानव है कभी देखा ?
वल्कल वस्त्र में तपस्वी राम
सुंदर वीर और यशस्वी राम
लक्ष्मण सीता भी संग चलते
दशरथ जी अब हाथ हैं मलते
अयोध्या वासी की चले टोली
आंसुओं की जैसे खेलें होली
राम मत जाओ रुक जाओ
हमें मरा अन्यथा तुम पाओ
रोए माएं नर,नारी व बालक
राम धीर और आज्ञा पालक
एक बार भी मुड़कर न देखा
न मुख पर एक दुख की रेखा
गुहा से अपना मित्र धर्म निभाया
सुमंत्र को फिर वापस है भिजाया
राम सीता के सेवक लक्ष्मण भाई
ऐसी क्या किसी ने की सेवकाई
चित्रकूट में कुटिया का निर्माण
आज भी उसके हैं वहां प्रमाण
सुरम्य वातावरण में जीवन सादा
भूल गए विपदा और सब बाधा
उधर भरत जब पहुंचे राजधानी
वहां फैली हुई थी सारी वीरानी
भरत ने केकई की सुनी वाणी
क्रोधित हो गए देखकर नादानी
दशरथ का कर अंतिम संस्कार
राम को वापस लाने का आसार
पूरी नगरी माताओं के संग चली
राम वापसी की आशा सबमें पली
राम में बसती हम सबकी जान
चित्रकूट के लिए किया प्रस्थान
लक्ष्मण ने जब देखा इन्हें आते
भरत सेना लिए चढ़े हैं यह जाते
राम ने तब लक्ष्मण को समझाया
भरत है मेरा प्रिय यह जब बताया
तब क्रोध उनका हुआ कुछ कम
देखो चार हैं भाई, पर एक हैं हम
भरत आते ही राम के चरण पड़े
माता कृत्य से शर्म से वह हैं गड़े
राम न देखें कभी किसी के दोष
हे माते भरत तुम हो सदा निर्दोष
चलो राम अयोध्या को हैं चलते
हम सब वहां अनाथ से हैं पलते
पिता के बाद अब आप ही तात
मत टालिए हमारी यह एक बात
आपका सेवक अपनी नाक रगड़े
मेरे पीछे अनजाने हो गए ये झगड़े
अब हमें कर दो क्षमा राम आप
कैसे हो गया यह अति घोर पाप
आप के स्थान मैं करता वनवास
आप रहो माता व प्रजा के पास
राम कहते मेरे पिता का था वर
करूं पूरा चाहे कट जाएगा सर
भरत की सारी विनती को टाला
हृदय में जैसे घोंपा हो कोई भाला
भरत ने भी अपना निर्णय सुनाया
अपने तो कर दिया हमको पराया
हे राम मैं धारण करूं साधु का वेश
व चौदह बरस करूं न नगर प्रवेश
सिंहासन पर आपकी खड़ाऊ रहेगी
आपकी अनुपस्थिति को वह कहेगी
राम भरत का यह मिलाप का प्रसंग
हर भाईयों का क्यों न हो ऐसा संग
रामचंद्र ने कई साल चित्रकूट बिताए
फिर वहां से वह नासिक को हैं आए
रावण की बहन शूर्पणखा है कामी
राम की प्रभुता से वह है अनजानी
एक पत्नी व्रत के पक्के मेरे राम
लक्ष्मण ने काट दिए नाक कान
खर दूषण चालीस हजार असुर
याद दिला दिए उनको तो ससुर
शूर्पणखा का है प्रतिशोध का भाव
रावण को दिलाया उसने तब ताव
मारीच को सोने का हिरन बनवाया
सीता माता का हृदय है ललचाया
माताओं को देंगे इसे हम उपहार
हे नाथ ! पकड़ लीजिए एक बार
सीते मैं हिरन को लेकर आऊं
लक्ष्मण तुमको यहीं छोड़ जाऊं
सीता का तुमको रखना ध्यान
असुर राक्षस से भरा है स्थान
मारीच मायावी मृग भागा जब
राम उसके पीछे पड़ गए तब
जब उसे लगा राम का तीर
उसके अंग में हुई अति पीर
झूठा राम के स्वर में वह रोया
यही सुन सीता ने आपा खोया
जाओ लक्ष्मण तुम्हे राम बुलाते
तुम उनकी सहायता को न जाते
लक्ष्मण बोले मेरे बड़े जो भाई
उनसे बल में नहीं है कोई ढाई
फिर भी आप जब देती आदेश
किसी को यहां न देना प्रवेश
साधु वेश धर रावण वहां आया
अकेली रूपवती स्त्री को पाया
भिक्षा मांगने की झूठा ढोंग रचा
उस कुटिया में अब कोई न बचा
राम लक्ष्मण जब वापस हैं आए
सीता को उस कुटिया में न पाए
सब ओर सीता को ढूंढें दोनों
एक एक वृक्ष सारे सारे कोनों
तभी मिले उन्हें घायल गिद्द राज
मरणासन्न हो गए करते राम काज
राम ने उनसे जाना रावण कुकर्म
सीता ले गया भूलकर सारा धर्म
जटायु ने एक ऐसी लड़ाई लड़ी
हारकर भी यह बात थी वह बड़ी
राम के हाथों हुआ अंतिम संस्कार
यह बताता है उत्तम भक्ति प्रकार
राम लक्ष्मण हर वन वन में जाते
सीता का पता नहीं कहीं हैं पाते
ऋषिमुख के निकट स्वयं को पाए
एक भिक्षुक उनके सम्मुख आए
अपना परिचय देने के बोले राम
भिक्षुक कृपया बताएं आप नाम
कैसे अति मूल्यवान हीरे की माला
आपने अपने गले में है इसे डाला
यह सुन उस भिक्षुक को आया भान
अरे यह तो मेरे आराध्य राम भगवान
अब हनुमान आए अपने मूल स्वरूप
सुंदर सुगठित अलौकिक उनका रूप
सुग्रीव से राम ने किया मित्रवत व्यवहार
वाली को मार दिया है राज्य का उपहार
सुग्रीव व बंधु मौज में करें जो इच्छा
राम लेकिन वन में करते हैं प्रतीक्षा
चातुर्मास पूर्ण होने को आया
सुग्रीव का न दिखे कोई साया
राम ने लक्ष्मण को भिजवाया
चेतावनी शब्द है कहलवाया
चार टोली चली चारों दिशा ओर
ढूंढेंगे सीता का मिले ओर छोर
खोजते हुए हनुमंत चले ही जाए
दक्षिण में सागर के सम्मुख पाए
लंका का पता संपाति ने बताया
समुद्र पार वहां सीता को छुपाया
कैसे इस समुद्र को पार है करना
नहीं तो यहीं पर हमें है अब मरना
जामवंत तब आगे आकर बोले
हे हनुमंत तुम हो बड़े ही भोले
तुममें शक्ति तेज भरा है अपार
बस राम नाम का ले लो आधार
हनुमान ने ऐसी सेवा करना ठानी
अनंत काल तक सुनाए यह कहानी
महेंद्र पर्वत से लगाई ऐसी छलांग
एक बार में समुद्र को देंगे वह लांघ
मैनाक ने दिया उनको सम्मान
थोड़ी देर कर लो आप विश्राम
राम काज करते हुए न आराम
अभी तो करने मुझे कई काम
सुरसा ने अपना मुख है फैलाया
हनुमंत ने छोटा रूप है धराया
मुख में प्रवेश करके बाहर आए
चतुर वानर उसे संतुष्ट कर पाए
सिंहीका ने पकड़ी जब छाया
हनुमंत ने थमा हुआ तब पाया
उसका तब वध ही एक उपाय
और पवन पुत्र बढ़ते ही जाए
लंकिनी को अपने सामने पाया
छोटा रूप धरकर उसे छकाया
सीता को कहां मैं ढूंढू अब
यहां तो सोए हुए हैं सब
अंततः मिली वाटिका अशोक
एक स्त्री करती वहां है शोक
राम कथा का जब किया गान
सीता में जैसे आए फिर प्राण
सीता ने मुद्रिका चिन्ह है दिया
एक वर्ष समय निर्धारित किया
मेरे राम जब आयेंगे सेना संग
रावण का उड़ जाएगा सब रंग
हनुमंत ने फिर की क्षुधा शांत
जला दिया सारा लंका प्रांत
रावण के अहंकार का नाश
नहीं बांध पाए राक्षसी पाश
राम को जब सुखद समाचार मिला
उनका बुझा हुआ हृदय अब खिला
अंक में भरे हनुमंत को भगवान
तुम मेरे सेवकों में सबसे महान
अब वानर सेना की तैयारी
वीरता दिखाने की है बारी
रावण की गलती पड़ेगी भारी
विभीषण ने समझाई बात सारी
पर विनाश काल रावण का आया
एक एक कर उठता सबका साया
विभीषण को राम ने है स्वीकारा
शरणागत है प्रभु का सदा प्यारा
समुद्र जब बना राम कोप भागी
प्रार्थना करने की मति है जागी
राम के नाम से पत्थर तैरते जाएं
एक सुंदर सेतु बनाता हुआ पाएं
पत्थरों पेड़ों से वानर करें वार
इंद्रजीत कुंभकरण गए हार
हुआ राम का रावण से सामना
दोनों विजयी होने की कामना
पर एक धर्म को करते धारण
और दूसरा अधर्म का कारण
कामी द्वेषी कभी न है जीता
चाहे ब्राह्मण हो उसके पिता
घोर युद्ध धर्म अधर्म का चलता
धर्म को सदा मिलती सफलता
राम विजयी हुए मिली सीता
अब उनका हृदय न है रीता
सारे वानर को तब राम ने जिलाया
पुष्पक विमान में उनको है बिठाया
अयोध्या में हुआ स्वागत अपार
भरत मिले उन्हें फिर एक बार
रामराज्य में आनंद अब छाया
राम नाम में हमने यह है पाया
राम राज्य और राम सा व्यवहार
यह है राम का अनुपम उपहार
गुरु महाराज प्रभुपाद ने दिया
मैने केवल लिपिबद्ध है किया
जय श्री राम!! HGD
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