“हे गुरुदेव
सबके हितैषी हैं गुरुदेव
मेरे तारणहार हैं एकमेव
मेरे गुरुदेव
मेरे गुरुदेव
कहां मैं था गुम और भटका
जन्म मृत्यु में था मैं अटका
गुरु कृपा ने बताया है पथ
चला पड़ा मेरा जीवन-रथ
हे गुरुदेव
हे गुरुदेव
मेरे लिए आपका अवतरण
धन्य धरा पड़े आपके चरण
कृपा धारा की बहती रेवा
अभागा मैं नहीं जानूं सेवा
श्री गुरुदेव
श्री गुरुदेव
जो मुझे आपने दी यह दीक्षा
सदा हृदय में बसे यह शिक्षा
आपको संतुष्ट करने के उपाय
आपके सेवा में रहूं मैं सहाय
जय गुरुदेव
जय गुरुदेव
जब भी आपका सानिध्य मिला
मेरा भक्ति बीज है तब ही खिला
जब जब आपसे हुआ संभाषण
मद मन पर किया आपने शासन
धन्य गुरुदेव
धन्य गुरुदेव
सदा मेरा जीवन आपको समर्पित
मन बुद्धि वचन आपको ही अर्पित
सदा नाम रुचि व वैष्णव सेवा भाव
आपकी कृपा का न हो कभी अभाव
कृपालु गुरुदेव
कृपालु गुरुदेव
आपकी व्यास पूजा है अवसर एक
समझूं मैं आपकी सेवा ही सबसे नेक
कहीं चरण की धूल में मुझे रखना
कहीं छूट न जाऊं आप मुझे तकना
दयालु गुरुदेव
दयालु गुरुदेव
श्रील प्रभुपाद के प्रामाणिक प्रतिनिधि
भक्ति की सिखाई गुह्यतम शुद्ध विधि
कृष्ण की कृपा का किया है वितरण
अधम बद्ध जीवों में जगाया आकर्षण
मैं पतित अधम कामी द्वेषी शूद्र खल
मेरे पास न है कोई आध्यात्मिक बल
आपकी कृपा से ही समस्या होगी हल
जानते हुए भी मैं करता हूं क्यों छल?
भले गुरुदेव
भले गुरुदेव
मुझे शक्ति दो मेरे गुरुदेव
मुझे शक्ति दो मेरे गुरुदेव
“
A humble offering at the Lotus feet of Srila Guru Dev who is beloved Disciple of Srila Prabhupada!!